Jan 15, 2012

Tu...kyu hai

तू मेरे पास है पर दिल तुजे ढूँढता क्यों है
भिखरी यादों पैर यह दर्द सा कोहरह क्यों है.
है ज़माने में कई रंज-ओ-सितम,
तेरी फुरकत ने परेशान मुझे किया क्यों है.
तू यह कहता है मैं तुझ्से, तू मुझसे नहीं,
फिर भी तुजे देखके मेरा दिल धड़कता क्यों है. 







Dec 28, 2011

रात की ख़ामोशी और हम

रात की ख़ामोशी भी कितना शोर मचा रही है,
उलझती हुई उलझनों को और उलझा रही है.

रेत की परतों पे जो मकान बनाये थे
उनके निशाँ अभी भी बाकी है.
वही छाप उस ख़ामोशी में तूफान बना रही है,
उलझती हुई उलझनों को और उलझा रही है.

रंगों को लेके हाथ में रंगती थी दुनिया को,
आज रंगों के दब्भों से डर रही है,
काले रंग की सिहाई में रंगों को छुपा रही है,
उलझती हुई उलझनों को और उलझा रही है.













Aug 30, 2011

Tum to aaj bhi ho

एक सदी भीत गयी, एक ज़माना चला गया,
रह-जुज़र हर तराना भीत गया.
कम्बक्ह्त यह दिल एहसास दिलाता है,
तू तो गया पर तेरा साया रह गया...

एक अरसा हुआ तुजे देखे हुए, तेरी सूरत का हर नक्षा याद है,
माना हाथों को हाथों में लिया नहीं कबसे,

Aug 4, 2011

दिल में इक बेताबी लेके चल रही हूँ
एक दिन तो एहसास हो तुझे मेरे इश्क का.

तू दोस्त ही तो था, एक छोटी सी पहचान ही तो थी,



May 31, 2011

Ek Pal

एक पल...कहाँ से लाऊं, 
की वोह पल तुम्हारे संग जी सकूं...
एक पल कहाँ से लाऊँ, 
छु सकूँ और महसूस कर सकूँ तुम्हे...

कितने पल भीत गए  वोह पल ढूँढने में,
चिरागों में, अंधेरों में, 
वोह पल कहाँ से लाऊं,
मेरी रौशनी के अंधेरों को हटा सके...

बैठती रही, सोंचती रही, 
कभी कभी तो रोती भी रही, 
बात करूँ  तो क्या करू, किस्से कहूँ,
कि वोह पल माँगा दो, दूंढ दो, दिला दो...

बारिश कि बूंदों में आंसुओं को छुपाती रही, 
अब तो बारिश भी नहीं होती है,
रात के सन्नाटे में ख़ामोशी सुनती रही, 
अब तो नींद भी नहीं आती है, 
वोह पल कहाँ से लाऊं,
जो बदल कि खनक में हरियाली कि चनक भरे, 
मेरी जिंदगी को एक जिंदगी का नाम दे...


May 14, 2011

Let's Begin The Day

The Baby Sun has come in my Balcony,
The warm rays are peeking thru  my door.
It has got the breeze in......
touching my body & soul...

and I wake up in the golden rain,
smell of soil & singing rain...
So let's go out n play, with the rainbow & Hay...

Dancing birds, and falling falls,
catch the clouds, n sing with birds...
come with me, I will take u to the Lovee...

May 10, 2011

Ghar mein kyu hai yeh mela hai...

चलो अब शाम हुई, घर में भी अँधेरा है.
कोई नहीं है मगर फिर क्यों यह मेला है..

हवा की सरसराहट या सिसकियाँ है रोने की,
कहो कुछ भी मगर एहसास सर्द सा क्यों है...
चलो अब शाम हुई, घर में भी अँधेरा है.

सीली हुई है जगह, सीला सा दर्पण है,
नमी है आँखों में मगर फिर भी सब क्यों गीला है...
चलो अब शाम हुई, घर में क्यों अँधेरा है.

Apr 15, 2011

Toota hua Ghada

मेरी जिंदगी एक टूटा हुआ घड़ा है,
हाथ में लेके जीये जा रही हु,
यह उम्मीद लगाये की जुड़ जाएगी कहीं.

लेकिन क्या टूटा हुआ घड़ा जुड़ पाया है कभी,
क्या ठहरा है पानी उसमें या थोड़ी सी नमी. 
चुभतें हैं टुकड़े लेके हाथों में अगर उनको, 
टूटी हुई चीज़ों को फैंका जाता है कहीं.

फिर मैं जिंदगी क्यों जी रही हु,
क्यों उमीदों की डोर सजाये बैठी हूँ.
लेलो न इसे, दफ़न कर दो कहीं,
आँखें बंद हूँगी तो सपनों का दामन छूटेगा तो सही...

Aitbaar

रिश्तों की इमारत बनाना कोई आसन खेल नहीं, 
इसे खड़ा करने के लिए बुनियाद चाहिए विशवास की.

ऐतबार...छोटा सा है लफ्ज़, 
   पर इसी लफ्ज़ ने बांधें दिलों के तार है.

किसी से हाथ मिलाना तो आसान है,
पर उस हाथ को थामे रखना कोई छोटी बात नहीं.

ऐ-दोस्त ऐतबार है तेरी हर बात पर,
       तेरे हर कदम पर,
अगर होता न यह विश्वास,
        तो शायद मेरे कदम न चल पते तुम्हारे संग,
न रोतीं मेरी आँखें तेरे दर्द-ओ-गम पर.

पर आज तेरी हर याद ने दर्ग उठाया है दिल में,
        वोह ऐतबार टूटकर चुभ गया है मुझसे.
कोई शिकायत तो नहीं तुझसे, 
पर तेरी हर बात पर दिल बात नहीं करता मुझसे.

तुझसे कोई शिकवा-शिकायत तो नहीं,
         पर अब शायद...
शायद इस दिल को जोड़ पाना तुम्हारे बस की बात नहीं...

Kuch pal

कितने हसीन है यह पल...
           जो तुम्हारे संग गुज़रते है.
शायद उन पलों को उस वक़्त नहीं जान पाती हु मैं,
           पर अकेले में, 
अकेले में वही पल चेहरे पर कुछ मुस्कान लातें है.

मुद्दत के इंतज़ार के बाद,
         अकेलेपन में उन पों को ढूँढती हुई, 
उनके मिलने पर शायद उन लम्हों की कद्र नहीं रहती मुझे,
          रूठना-मानना, तू तू, मैं मैं...
इनमे ही पल कैसे चले जातें है.
           पर अकेले में...
अकेले में याद आता है कि हर पल कितना ख़ास है. 

शर्म आती है पर कैसे कहूँ...
          कैसे कहूँ कि शर्मिंदा हूँ अपने आप पर.
कैसे तुम चुनकर लेट हो वह अनमोल पल,
          और मैं तुम्हें रुलाती-सताती हु उन्हें तोड़ कर.

अब इंतज़ार है उन्हीं पलों का,
        और आँखें भुन रहीं है नए सपने,
मन तुम्हारे दिल को दर्द हुआ कुछ कम नहीं,
           पर उस दर्द में...
उस दर्द में मेरे प्यार कि मिठास है बढकर कहीं. 

बड़ी किस्मत है तुम मिले हो,
            कुछ इंतज़ार ही सही...
कुछ पल ही सही...