Mar 7, 2017

सूखा पेड़

इस पेड़ की हर शाख़ से गिरता पत्ता
कहता है मैं तेरा कभी था ही नहीं।
जो रंग उड़ा उस पेड़ का,
जैसे कभी पानी मिला ही नहीं।
अब कौनसी हवा में खनक बजेगी,
कौन सा घोंसला बनेगा अभी।

अब घबराया वोह पेड़
टहनियों में ख़ुद को छुपाने की कोशिश करता है,
तेज़ झोंका भी उसके जिगर को हिला कर रखता है।
उम्मीद ना धूप आने की है,
ना गुज़री हुई बारिश की।
रात के अंधेरे मैं अब या डराता है,
या शायद ख़ुद से ही डर जाता है।

---इशा---

Feb 5, 2017

कमबख़्त मोहब्बत

मोहब्बत इबादत से कम नहीं,
खुदा है फिर भी खुदा का कुछ पता नहीं।
कोई कहता है जन्नत के रास्ते पे चला है तू,
पर इससे बड़ा दर्द कुछ भी नहीं।
आब-ए-हयात सा मीठा कह ले कोई,
सूकूँ-ए-दिल से बहले कोई,
समन्दर से ज़्यादा बहते आसूँ,
दोज़ख़ से कम ग़म नहीं।

---इशा---

Jan 31, 2017

सहलाब

यह बंद रौशनदानों के पीछे पानी की लकीरौं को देखो,
किसे पता है कि बाहर सहलाब अाया है।

....ईशा...

ख़ामोशी

ख़ामोशी कभी सुनी है
घड़ी की टिक टिक,
पत्तों पे पड़े बारिश की आवाज़,
कहीं दूर कुछ कुत्तों के भोंकना,
पड़ोसी के घर में चलते टी॰वी॰ की आवाज़।
यह तो सब आवाज़ें है। ख़ामोशी नहीं।

तो सुनो ख़ामोशी की आवाज़...
पुरानी दबी यादों पे से धूल छटने की आवाज़,
उस पल में गुनगुनाए गाने की कानों में आवाज़,
दिल की हर धड़कन में दर्द की आवाज़,
उसकी भूली हुई साँसों को आपने कानों में सुन ने की आवाज़।

कितनी ही ऐसी आवाज़ों का मेला लगता है,
कितनी ही ऐसी आवाज़ों ka शोर मचता है,
कभी चुप चाप तकिए को भिगोता है,
तो कभी दिल ke कोने में दुबक sa जाता है।
Par रहती है कहीं आस-पास,
यह ख़ामोशी, यह आवाज़।

-----इशा----

मूवर & पैकर

दीवारें अपनी ना भी हो
पर कुछ वक़्त गुज़ार लो उनके साथ
तो छोड़ते वक़्त उनके लिए भी आखें गीली होती है।
कितनी रातों को अकेला माना होगा
पर दीवारों ने ही मुझे झेला था।
कभी रोके चिल्लाना, कभी डर के मुँह छुपाना।
हर दीवार के साथ मेरी एक कहानी।

---इशा---

गुज़री यादें

मद्धम रौशनी मद्धम हम,
मद्धम पलों में ठहरें हम,
कुछ गुज़री यादों का, कुछ गुज़री बातों का,
चाँद बनाने चलें हैं हम।

उस चाँद के नीचे गुज़रा ज़माना,
फिर से चलें हैं जीने हम।
छुपती छुपाती यादों का,
बारिश में भीगी बातों का,
कुछ गुज़री यादों का, कुछ गुज़री बातों का,
आइना बनाने चले है हम।

-----इशा----

दर्द की रोशनी

सपनों की आहट तो तब सुनायी देगी,
जब आखों में नींद के पर्दे होंगे ।
यहाँ तो कोई दर्द की रोशनी
काली सी रात को भी भर देगी ।

---इशा---

रंग

काला रंग भी कितना अपना है
हर रंग को ख़ुदमे समा लेता है।
अब सफ़ेद रंग तो देख लो
कोई रंग जुड़े तो दाग़ कहलाता है।

---इशा----

ग़ालिब १

ऐ ग़ालिब तेरे रास्ते पे अब मैं नहीं खड़ी हूँगी,
कहीं तेरी शायरी बुरा ना मान जाए ।

----इशा---

गिरता hua आँसु

इस अहसास का ज़िक्र जब भी किया उससे,
अल्फ़ाज़ों के बिस्तर में चेहरा छुपा लिया,
वहीं नर्म तकिए पर गिरता मेरा आँसूँ,
नीम-बे-होशि में उसने अपनी आँखों में लिया।

---इशा---